श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 65: जंगली हाथियोंद्वारा व्यापारियोंके दलका सर्वनाश तथा दु:खित दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें सुखपूर्वक निवास  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.65.17 
सामान्यमेतद् द्रविणं न मिथ्यावचनं मम॥ १७॥
 
 
अनुवाद
तीसरा कहता था - 'भाई ! इस धन पर सबका समान अधिकार है, मैं जो कह रहा हूँ वह मिथ्या नहीं है ॥17॥
 
The third one used to say - 'Brother! Everyone has equal right over this wealth, what I am saying is not false.'॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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