श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 65: जंगली हाथियोंद्वारा व्यापारियोंके दलका सर्वनाश तथा दु:खित दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें सुखपूर्वक निवास  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  3.65.13-14 
निहतोष्ट्राश्वबहुला: पदातिजनसंकुला:।
भयादाधावमानाश्च परस्परहतास्तदा॥ १३॥
घोरान्नादान् विमुञ्चन्तो निपेतुर्धरणीतले।
वृक्षेष्वारुह्य संरब्धा: पतिता विषमेषु च॥ १४॥
 
 
अनुवाद
उनके बहुत से ऊँट और घोड़े मारे गए और समूह में बहुत से पैदल यात्री भी थे। वे सब-के-सब डरकर भाग रहे थे और एक-दूसरे से टकराकर चोट खा रहे थे। सब लोग जोर-जोर से चिल्लाते हुए धरती पर गिरने लगे। कुछ लोग बड़े वेग से वृक्षों पर चढ़ गए और नीचे ऊबड़-खाबड़ भूमि पर गिर पड़े॥13-14॥
 
Many of their camels and horses were killed and there were many pedestrians in the group. All of them were running in fear and getting hurt by colliding with each other. Everyone started falling on the ground while making loud cries of pain. Some people climbed the trees with great speed and fell on the uneven ground below.॥13-14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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