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mahabharat 3.64.9-10: उस वन में विदर्भ की कन्या ने भैंसों, सूअरों, भालुओं और जंगली साँपों के झुंड देखे। तेज, यश, ऐश्वर्य और परम धैर्य से संपन्न विदर्भ की कन्या उस समय अकेली भ्रमण करती हुई नल को खोज रही थी।   |   mahabharat अध्याय 3.64: दमयन्तीका विलाप और प्रलाप, तपस्वियोंद्वारा दमयन्तीको आश्वासन तथा उसकी व्यापारियोंके दलसे भेंट   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 64: दमयन्तीका विलाप और प्रलाप, तपस्वियोंद्वारा दमयन्तीको आश्वासन तथा उसकी व्यापारियोंके दलसे भेंट  »  श्लोक 9-10
 
 
श्लोक  3.64.9-10 
यूथशो ददृशे चात्र विदर्भाधिपनन्दिनी।
महिषांश्च वराहांश्च ऋक्षांश्च वनपन्नगान्॥ ९॥
तेजसा यशसा लक्ष्म्या स्थित्या च परया युता।
वैदर्भी विचरत्येका नलमन्वेषती तदा॥ १०॥
 
 
अनुवाद
उस वन में विदर्भ की कन्या ने भैंसों, सूअरों, भालुओं और जंगली साँपों के झुंड देखे। तेज, यश, ऐश्वर्य और परम धैर्य से संपन्न विदर्भ की कन्या उस समय अकेली भ्रमण करती हुई नल को खोज रही थी।
 
Vidarbha's daughter saw herds of buffaloes, pigs, bears and wild snakes in that forest. Vidarbha's daughter, who was endowed with brilliance, fame, splendor and utmost patience, was wandering alone at that time and looking for Nala. 9-10.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)