श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 64: दमयन्तीका विलाप और प्रलाप, तपस्वियोंद्वारा दमयन्तीको आश्वासन तथा उसकी व्यापारियोंके दलसे भेंट  »  श्लोक 87-88
 
 
श्लोक  3.64.87-88 
कच्चिद् भगवतां रम्यं तपोवनमिदं नृप:।
भवेत् प्राप्तो नलो नाम निषधानां जनाधिप:॥ ८७॥
यत्कृतेऽहमिदं ब्रह्मन् प्रपन्ना भृशदारुणम्।
वनं प्रतिभयं घोरं शार्दूलमृगसेवितम्॥ ८८॥
 
 
अनुवाद
'प्रभो! क्या निषादनरेश तप आपके इस रमणीय तपोवन में आये थे? ब्रह्मन्! मैं किसके लिए इस अत्यन्त भयंकर, भयंकर, भयंकर वन में आया हूँ, जहाँ व्याघ्र, सिंह आदि पशु रहते हैं॥87-88॥
 
'Lord! Did Nishadhanresh tap come to this delightful Tapovan of yours? Brahman! For whom I have come to this very dangerous, terrible, terrible forest, served by animals like tiger, lion etc. 87-88॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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