श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 64: दमयन्तीका विलाप और प्रलाप, तपस्वियोंद्वारा दमयन्तीको आश्वासन तथा उसकी व्यापारियोंके दलसे भेंट  »  श्लोक 74-75
 
 
श्लोक  3.64.74-75 
अस्याश्च नद्या: कल्याणि वद सत्यमनिन्दिते।
साब्रवीत् तानृषीन्नाहमरण्यस्यास्य देवता॥ ७४॥
न चाप्यस्य गिरेर्विप्रा नैव नद्याश्च देवता।
मानुषीं मां विजानीत यूयं सर्वे तपोधना:॥ ७५॥
 
 
अनुवाद
‘अनिंदिते! कल्याणी! क्या तुम इस नदी की अधिष्ठात्री देवी हो? मुझे सत्य बताओ।’ दमयन्ती ने उन ऋषियों से कहा - ‘हे तपस्वी ब्राह्मणों! मैं न तो इस वन की देवी हूँ, न इस पर्वत की अधिष्ठात्री देवी हूँ, न इस नदी की देवी हूँ। आप सब लोग मुझे मनुष्य ही समझो।’ 74-75॥
 
‘Anindite! Kalyani! Or are you the presiding goddess of this river, tell me the truth.' Damayanti said to those sages - 'O Brahmins rich in penance! I am neither the goddess of this forest, nor the presiding deity of this mountain, nor the goddess of this river. You all consider me a human being. 74-75॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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