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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 64: दमयन्तीका विलाप और प्रलाप, तपस्वियोंद्वारा दमयन्तीको आश्वासन तथा उसकी व्यापारियोंके दलसे भेंट  »  श्लोक 72-73
 
 
श्लोक  3.64.72-73 
ब्रूहि सर्वानवद्याङ्गि का त्वं किं च चिकीर्षसि।
दृष्ट्वैव ते परं रूपं द्युतिं च परमामिह॥ ७२॥
विस्मयो न: समुत्पन्न: समाश्वसिहि मा शुच:।
अस्यारण्यस्य देवी त्वमुताहोऽस्य महीभृत:॥ ७३॥
 
 
अनुवाद
'सर्वांगसुन्दरी! मुझे बताइए, आप कौन हैं और क्या करना चाहती हैं? यहाँ आपके उत्तम रूप और अत्यंत मनोहर कांति को देखकर हमें बड़ा आश्चर्य हो रहा है। धैर्य रखें, शोक न करें। क्या आप इस वन की देवी हैं या इस पर्वत की अधिष्ठात्री देवी हैं? 72-73।
 
‘Sarvangasundari! Tell me, who are you and what do you want to do? We are very surprised to see your excellent form and extremely beautiful radiance here. Be patient, do not grieve. Are you the goddess of this forest or the presiding deity of this mountain? 72-73.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)