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mahabharat 3.64.70-71: उस समय सुन्दर शरीरवाली दमयन्ती ने उनसे कहा - 'प्रभो! निष्पाप महात्माओं! यहाँ आप तप, अग्निहोत्र, धर्म, मृग-पक्षी पालन तथा धर्माचरण आदि कार्यों में सकुशल हैं?' तब उन महात्माओं ने कहा - 'भद्रे! यशस्विनी! सर्वत्र कुशल हैं ॥ 70-71॥   |   mahabharat अध्याय 3.64: दमयन्तीका विलाप और प्रलाप, तपस्वियोंद्वारा दमयन्तीको आश्वासन तथा उसकी व्यापारियोंके दलसे भेंट   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 64: दमयन्तीका विलाप और प्रलाप, तपस्वियोंद्वारा दमयन्तीको आश्वासन तथा उसकी व्यापारियोंके दलसे भेंट  »  श्लोक 70-71
 
 
श्लोक  3.64.70-71 
तानुवाच वरारोहा कच्चिद् भगवतामिह।
तप:स्वग्निषु धर्मेषु मृगपक्षिषु चानघा:॥ ७०॥
कुशलं वो महाभागा: स्वधर्माचरणेषु च।
तैरुक्ता कुशलं भद्रे सर्वत्रेति यशस्विनि॥ ७१॥
 
 
अनुवाद
उस समय सुन्दर शरीरवाली दमयन्ती ने उनसे कहा - 'प्रभो! निष्पाप महात्माओं! यहाँ आप तप, अग्निहोत्र, धर्म, मृग-पक्षी पालन तथा धर्माचरण आदि कार्यों में सकुशल हैं?' तब उन महात्माओं ने कहा - 'भद्रे! यशस्विनी! सर्वत्र कुशल हैं ॥ 70-71॥
 
At that time Damayanti with beautiful body said to him – 'Lord! Sinless great ones! Here, are you safe in matters like penance, Agnihotra, religion, rearing deer and birds and practicing your religion etc?' Then those Mahatmas said - 'Bhadre! Yashaswini! Is efficient everywhere. 70-71॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)