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mahabharat 3.64.65: उस आश्रम में नाना प्रकार के मृग और वानर भी विचरण करते थे। तपस्वी मुनियों से भरे उस आश्रम को देखकर दमयन्ती को बहुत शांति मिली।   |   mahabharat अध्याय 3.64: दमयन्तीका विलाप और प्रलाप, तपस्वियोंद्वारा दमयन्तीको आश्वासन तथा उसकी व्यापारियोंके दलसे भेंट   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 64: दमयन्तीका विलाप और प्रलाप, तपस्वियोंद्वारा दमयन्तीको आश्वासन तथा उसकी व्यापारियोंके दलसे भेंट  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  3.64.65 
नानामृगगणैर्जुष्टं शाखामृगगणायुतम्।
तापसै: समुपेतं च सा दृष्ट्वैव समाश्वसत्॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
उस आश्रम में नाना प्रकार के मृग और वानर भी विचरण करते थे। तपस्वी मुनियों से भरे उस आश्रम को देखकर दमयन्ती को बहुत शांति मिली।
 
Various kinds of deer and monkeys also roamed around in that hermitage. Damayanti felt very comforted when she saw that hermitage full of ascetic saints. 65.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)