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mahabharat 3.64.36: अरे! इस घने जंगल में मेरा विलाप सुनकर भी यह सिंह मुझे सांत्वना नहीं दे रहा है। वह तो इस स्वादिष्ट जल से भरी हुई सागरीय नदी की ओर जा रहा है।   |   mahabharat अध्याय 3.64: दमयन्तीका विलाप और प्रलाप, तपस्वियोंद्वारा दमयन्तीको आश्वासन तथा उसकी व्यापारियोंके दलसे भेंट   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 64: दमयन्तीका विलाप और प्रलाप, तपस्वियोंद्वारा दमयन्तीको आश्वासन तथा उसकी व्यापारियोंके दलसे भेंट  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  3.64.36 
श्रुत्वारण्ये विलपितं न मामाश्वासयत्ययम्।
यात्येतां स्वादुसलिलामापगां सागरंगमाम्॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
अरे! इस घने जंगल में मेरा विलाप सुनकर भी यह सिंह मुझे सांत्वना नहीं दे रहा है। वह तो इस स्वादिष्ट जल से भरी हुई सागरीय नदी की ओर जा रहा है।
 
Oh! Even after hearing my wailings in this dense forest this lion is not consoling me. He is going towards this ocean-going river filled with delicious water.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)