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mahabharat 3.64.35: "अथवा हे वन के राजा और मृगश्रेष्ठ! यदि आप मुझे नल के विषय में कुछ भी न बताएँ तो आप मुझे खाकर इस दुःख से मुक्ति दिला दीजिए।" ॥35॥   |   mahabharat अध्याय 3.64: दमयन्तीका विलाप और प्रलाप, तपस्वियोंद्वारा दमयन्तीको आश्वासन तथा उसकी व्यापारियोंके दलसे भेंट   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 64: दमयन्तीका विलाप और प्रलाप, तपस्वियोंद्वारा दमयन्तीको आश्वासन तथा उसकी व्यापारियोंके दलसे भेंट  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  3.64.35 
अथवा त्वं वनपते नलं यदि न शंससि।
मां खादय मृगश्रेष्ठ दु:खादस्माद् विमोचय॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
"अथवा हे वन के राजा और मृगश्रेष्ठ! यदि आप मुझे नल के विषय में कुछ भी न बताएँ तो आप मुझे खाकर इस दुःख से मुक्ति दिला दीजिए।" ॥35॥
 
"Or, O king of the forest and best of the deer! If you do not tell me anything about Nala, then eat me and relieve me of this sorrow." ॥ 35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)