श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 64: दमयन्तीका विलाप और प्रलाप, तपस्वियोंद्वारा दमयन्तीको आश्वासन तथा उसकी व्यापारियोंके दलसे भेंट  »  श्लोक 130
 
 
श्लोक  3.64.130 
ऋते त्वां मानुषीं मर्त्यं न पश्यामि महावने।
तथा नो यक्षराडद्य मणिभद्र: प्रसीदतु॥ १३०॥
 
 
अनुवाद
'इस विशाल वन में मैंने तुम्हारे समान मानव कन्या के अतिरिक्त अन्य कोई मनुष्य नहीं देखा है। अतः आज यक्षराज मणिभद्र हम पर प्रसन्न हों।'॥130॥
 
'I have not seen any other human being in this vast forest except a human girl like you. Therefore, may Yaksharaj Manibhadra be pleased with us today.'॥ 130॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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