Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 3.64.13-14: दमयन्ती बोली - हे विशाल वक्ष वाले और महाबाहु निषधराज! आज आप मुझे इस निर्जन वन में अकेला छोड़कर कहाँ चले गए? हे नरश्रेष्ठ! हे वीर! प्रचुर मात्रा में आहुति देने वाले अश्वमेध जैसे यज्ञ करके भी आप मेरे साथ अन्याय क्यों कर रहे हैं?॥13-14॥   |   mahabharat अध्याय 3.64: दमयन्तीका विलाप और प्रलाप, तपस्वियोंद्वारा दमयन्तीको आश्वासन तथा उसकी व्यापारियोंके दलसे भेंट   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 64: दमयन्तीका विलाप और प्रलाप, तपस्वियोंद्वारा दमयन्तीको आश्वासन तथा उसकी व्यापारियोंके दलसे भेंट  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  3.64.13-14 
दमयन्त्युवाच
व्यूढोरस्क महाबाहो नैषधानां जनाधिप।
क्व नु राजन् गतोऽस्यद्य विसृज्य विजने वने॥ १३॥
अश्वमेधादिभिर्वीर क्रतुभिर्भूरिदक्षिणै:।
कथमिष्ट्वा नरव्याघ्र मयि मिथ्या प्रवर्तसे॥ १४॥
 
 
अनुवाद
दमयन्ती बोली - हे विशाल वक्ष वाले और महाबाहु निषधराज! आज आप मुझे इस निर्जन वन में अकेला छोड़कर कहाँ चले गए? हे नरश्रेष्ठ! हे वीर! प्रचुर मात्रा में आहुति देने वाले अश्वमेध जैसे यज्ञ करके भी आप मेरे साथ अन्याय क्यों कर रहे हैं?॥13-14॥
 
Damayanti said: O broad-chested and powerful-armed King of Nishadhans, where have you gone today, leaving me alone in this deserted forest? O best of men, O bravest of men, why are you behaving unfairly with me even after performing sacrifices like Ashwamedha with abundant offerings?॥ 13-14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)