श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 64: दमयन्तीका विलाप और प्रलाप, तपस्वियोंद्वारा दमयन्तीको आश्वासन तथा उसकी व्यापारियोंके दलसे भेंट  »  श्लोक 127
 
 
श्लोक  3.64.127 
तामुवाचानवद्याङ्गीं सार्थस्य महत: प्रभु:।
सार्थवाह: शुचिर्नाम शृणु कल्याणि मद्वच:॥ १२७॥
 
 
अनुवाद
उस महान् समूहका स्वामी तथा सम्पूर्ण यात्रीदलका संचालक (व्यापारी) शुचीन नामसे प्रसिद्ध था। उसने उस सुन्दरीसे कहा - 'कल्याणि! मेरी बात सुनो'- ॥127॥
 
The owner of that great group and the director (merchant) of the entire traveling party was famous by the name Shuchina. He said to that beautiful woman – ‘Kalyani! Listen to me'-. 127॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd