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mahabharat 3.64.123-124: इस समाज के नेताओं से, इस जनसमूह से तथा इसमें रहने वाले तथा इनसे आगे चलने वाले युवक-युवतियों से मैं प्रार्थना करती हूँ कि आप सब मुझे मनुष्य ही समझें। मैं एक राजा की पुत्री, एक महाराजा की पुत्रवधू तथा एक राजा की पत्नी हूँ। मैं अपने स्वामी के दर्शन की इच्छा से इस वन में विचरण कर रही हूँ।॥123-124॥   |   mahabharat अध्याय 3.64: दमयन्तीका विलाप और प्रलाप, तपस्वियोंद्वारा दमयन्तीको आश्वासन तथा उसकी व्यापारियोंके दलसे भेंट   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 64: दमयन्तीका विलाप और प्रलाप, तपस्वियोंद्वारा दमयन्तीको आश्वासन तथा उसकी व्यापारियोंके दलसे भेंट  »  श्लोक 123-124
 
 
श्लोक  3.64.123-124 
सार्थवाहं च सार्थं च जना ये चात्र केचन।
युवस्थविरबालाश्च सार्थस्य च पुरोगमा:॥ १२३॥
मानुषीं मां विजानीत मनुजाधिपते: सुताम्।
नृपस्नुषां राजभार्यां भर्तृदर्शनलालसाम्॥ १२४॥
 
 
अनुवाद
इस समाज के नेताओं से, इस जनसमूह से तथा इसमें रहने वाले तथा इनसे आगे चलने वाले युवक-युवतियों से मैं प्रार्थना करती हूँ कि आप सब मुझे मनुष्य ही समझें। मैं एक राजा की पुत्री, एक महाराजा की पुत्रवधू तथा एक राजा की पत्नी हूँ। मैं अपने स्वामी के दर्शन की इच्छा से इस वन में विचरण कर रही हूँ।॥123-124॥
 
‘To the leaders of this community, to this crowd and to the young and young people living in it and going ahead of them, I request all of you to consider me as a human being. I am the daughter of a king, the daughter-in-law of a Maharaja and the wife of a king. I am wandering in this forest with the desire to see my master.॥ 123-124॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)