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mahabharat 3.64.119: 'कल्याणि! सच-सच बताओ, क्या तुम इस वन, पर्वत या दिशा की अधिष्ठात्री नहीं हो? हम सब तुम्हारी शरण में आये हैं ॥119॥   |   mahabharat अध्याय 3.64: दमयन्तीका विलाप और प्रलाप, तपस्वियोंद्वारा दमयन्तीको आश्वासन तथा उसकी व्यापारियोंके दलसे भेंट   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 64: दमयन्तीका विलाप और प्रलाप, तपस्वियोंद्वारा दमयन्तीको आश्वासन तथा उसकी व्यापारियोंके दलसे भेंट  »  श्लोक 119
 
 
श्लोक  3.64.119 
वद सत्यं वनस्यास्य पर्वतस्याथवा दिश:।
देवता त्वं हि कल्याणि त्वां वयं शरणं गता:॥ ११९॥
 
 
अनुवाद
'कल्याणि! सच-सच बताओ, क्या तुम इस वन, पर्वत या दिशा की अधिष्ठात्री नहीं हो? हम सब तुम्हारी शरण में आये हैं ॥119॥
 
'Kalyani! Tell me the truth, aren't you the presiding deity of this forest, mountain or direction? We all have come to your refuge. 119॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)