श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 64: दमयन्तीका विलाप और प्रलाप, तपस्वियोंद्वारा दमयन्तीको आश्वासन तथा उसकी व्यापारियोंके दलसे भेंट  »  श्लोक 118
 
 
श्लोक  3.64.118 
कासि कस्यासि कल्याणि किं वा मृगयसे वने।
त्वां दृष्ट्वा व्यथिता: स्मेह कच्चित् त्वमसि मानुषी॥ ११८॥
 
 
अनुवाद
कल्याणी! तुम कौन हो? किसकी पत्नी हो और इस वन में क्या ढूँढ़ रही हो? तुम्हें देखकर हमें बड़ा दुःख हो रहा है। क्या तुम मनुष्य हो?॥118॥
 
‘Kalyani! Who are you? Whose wife are you and what are you looking for in this forest? We are very sad to see you. Are you a human being?॥ 118॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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