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mahabharat 3.64.117: कुछ लोग उसका उपहास कर रहे थे और कुछ उसमें दोष ढूंढ रहे थे। भारत! उनमें से कुछ लोग ऐसे भी थे जो उस पर दया करके उसका कुशल-क्षेम पूछने लगे॥117॥   |   mahabharat अध्याय 3.64: दमयन्तीका विलाप और प्रलाप, तपस्वियोंद्वारा दमयन्तीको आश्वासन तथा उसकी व्यापारियोंके दलसे भेंट   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 64: दमयन्तीका विलाप और प्रलाप, तपस्वियोंद्वारा दमयन्तीको आश्वासन तथा उसकी व्यापारियोंके दलसे भेंट  »  श्लोक 117
 
 
श्लोक  3.64.117 
प्रहसन्ति स्म तां केचिदभ्यसूयन्ति चापरे।
अकुर्वत दयां केचित् पप्रच्छुश्चापि भारत॥ ११७॥
 
 
अनुवाद
कुछ लोग उसका उपहास कर रहे थे और कुछ उसमें दोष ढूंढ रहे थे। भारत! उनमें से कुछ लोग ऐसे भी थे जो उस पर दया करके उसका कुशल-क्षेम पूछने लगे॥117॥
 
Some people were making fun of him and some were finding faults in him. Bhaarat! Among them there were some people who felt pity for him and asked about his well-being.॥ 117॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)