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mahabharat 3.64.108: इस प्रकार दु:खी हुई सुन्दरी दमयन्ती उस अशोक वृक्ष की परिक्रमा करके वहाँ से अत्यन्त भयानक स्थान की ओर चली गई ॥108॥   |   mahabharat अध्याय 3.64: दमयन्तीका विलाप और प्रलाप, तपस्वियोंद्वारा दमयन्तीको आश्वासन तथा उसकी व्यापारियोंके दलसे भेंट   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 64: दमयन्तीका विलाप और प्रलाप, तपस्वियोंद्वारा दमयन्तीको आश्वासन तथा उसकी व्यापारियोंके दलसे भेंट  »  श्लोक 108
 
 
श्लोक  3.64.108 
एवं साशोकवृक्षं तमार्ता वै परिगम्य ह।
जगाम दारुणतरं देशं भैमी वराङ्गना॥ १०८॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार दु:खी हुई सुन्दरी दमयन्ती उस अशोक वृक्ष की परिक्रमा करके वहाँ से अत्यन्त भयानक स्थान की ओर चली गई ॥108॥
 
In this way, the beautiful Damayanti, who was saddened, circumambulated that Ashoka tree and went from there towards a very dangerous place. 108॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)