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mahabharat 3.63.8: 'पुरुषोत्तम! यहाँ इतना हास्य पर्याप्त है। बहुत वीर योद्धा! मैं बहुत भयभीत हूँ। जीवन के स्वामी! अब मुझे अपने दर्शन दीजिए।'   |   mahabharat अध्याय 3.63: दमयन्तीका विलाप तथा अजगर एवं व्याधसे उसके प्राण एवं सतीत्वकी रक्षा तथा दमयन्तीके पातिव्रत्यधर्मके प्रभावसे व्याधका विनाश   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 63: दमयन्तीका विलाप तथा अजगर एवं व्याधसे उसके प्राण एवं सतीत्वकी रक्षा तथा दमयन्तीके पातिव्रत्यधर्मके प्रभावसे व्याधका विनाश  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  3.63.8 
पर्याप्त: परिहासोऽयमेतावान् पुरुषर्षभ।
भीताहमतिदुर्धर्ष दर्शयात्मानमीश्वर॥ ८॥
 
 
अनुवाद
'पुरुषोत्तम! यहाँ इतना हास्य पर्याप्त है। बहुत वीर योद्धा! मैं बहुत भयभीत हूँ। जीवन के स्वामी! अब मुझे अपने दर्शन दीजिए।'
 
'Best of men! This much humour is enough here. Very brave warrior! I am very scared. Lord of life! Now please give me your darshan.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)