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mahabharat 3.63.4: ‘महाराज! आप धर्म के ज्ञाता और सत्यवादी हैं; फिर ऐसी सच्ची प्रतिज्ञा करके आप आज मुझे इस वन में सोता हुआ छोड़कर कैसे चले गए?॥4॥   |   mahabharat अध्याय 3.63: दमयन्तीका विलाप तथा अजगर एवं व्याधसे उसके प्राण एवं सतीत्वकी रक्षा तथा दमयन्तीके पातिव्रत्यधर्मके प्रभावसे व्याधका विनाश   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 63: दमयन्तीका विलाप तथा अजगर एवं व्याधसे उसके प्राण एवं सतीत्वकी रक्षा तथा दमयन्तीके पातिव्रत्यधर्मके प्रभावसे व्याधका विनाश  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  3.63.4 
ननु नाम महाराज धर्मज्ञ: सत्यवागसि।
कथमुक्त्वा तथा सत्यं सुप्तामुत्सृज्य कानने॥ ४॥
 
 
अनुवाद
‘महाराज! आप धर्म के ज्ञाता और सत्यवादी हैं; फिर ऐसी सच्ची प्रतिज्ञा करके आप आज मुझे इस वन में सोता हुआ छोड़कर कैसे चले गए?॥4॥
 
‘Maharaj! You are a knower of Dharma and a truthful person; then after making such a true promise how did you leave me sleeping in this forest and go away today?॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)