श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 63: दमयन्तीका विलाप तथा अजगर एवं व्याधसे उसके प्राण एवं सतीत्वकी रक्षा तथा दमयन्तीके पातिव्रत्यधर्मके प्रभावसे व्याधका विनाश  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  3.63.36 
स तु पापमति: क्षुद्र: प्रधर्षयितुमातुर:।
दुर्धर्षां तर्कयामास दीप्तामग्निशिखामिव॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि दुष्ट शिकारी दमयन्ती के साथ बलात्कार करने के लिए आतुर था, किन्तु दमयन्ती अग्नि की ज्वाला के समान प्रज्वलित थी, इसलिए उसे छूना उसके लिए अत्यन्त कठिन प्रतीत हो रहा था।
 
Though the wicked hunter was anxious to rape her, Damayanti was blazing like a flame of fire; therefore touching her seemed extremely difficult to him.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)