श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 63: दमयन्तीका विलाप तथा अजगर एवं व्याधसे उसके प्राण एवं सतीत्वकी रक्षा तथा दमयन्तीके पातिव्रत्यधर्मके प्रभावसे व्याधका विनाश  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  3.63.12 
कथं नु राजंस्तृषित: क्षुधित: श्रमकर्षित:।
सायाह्ने वृक्षमूलेषु मामपश्यन् भविष्यसि॥ १२॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! जब तुम भूखे-प्यासे और परिश्रम से थके हुए सायंकाल के समय किसी वृक्ष के नीचे विश्राम करोगे, तब यदि मुझे अपने निकट न पाओगे, तो तुम्हारा क्या होगा?॥12॥
 
'O King! When you, hungry and thirsty and tired from hard work, will rest under a tree in the evening, what will happen to you if you do not find me near you?'॥ 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)