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mahabharat 3.63.11: 'प्रभु! मैं अपने लिए शोक नहीं कर रहा हूँ। मैं किसी अन्य वस्तु के लिए शोक नहीं कर रहा हूँ। मैं केवल आपके लिए शोक कर रहा हूँ कि आप अकेले कितनी दयनीय स्थिति में होंगे!॥11॥   |   mahabharat अध्याय 3.63: दमयन्तीका विलाप तथा अजगर एवं व्याधसे उसके प्राण एवं सतीत्वकी रक्षा तथा दमयन्तीके पातिव्रत्यधर्मके प्रभावसे व्याधका विनाश   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 63: दमयन्तीका विलाप तथा अजगर एवं व्याधसे उसके प्राण एवं सतीत्वकी रक्षा तथा दमयन्तीके पातिव्रत्यधर्मके प्रभावसे व्याधका विनाश  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  3.63.11 
न शोचाम्यहमात्मानं न चान्यदपि किंचन।
कथं नु भवितास्येक इति त्वां नृप शोचिमि॥ ११॥
 
 
अनुवाद
'प्रभु! मैं अपने लिए शोक नहीं कर रहा हूँ। मैं किसी अन्य वस्तु के लिए शोक नहीं कर रहा हूँ। मैं केवल आपके लिए शोक कर रहा हूँ कि आप अकेले कितनी दयनीय स्थिति में होंगे!॥11॥
 
'Lord! I am not grieving for myself. I am not grieving for anything else. I am grieving only for you that what a pitiable condition you will find yourself in alone!॥ 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)