श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 61: नलका जूएमें हारकर दमयन्तीके साथ वनको जाना और पक्षियोंद्वारा आपद्‍ग्रस्त नलके वस्त्रका अपहरण  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  3.61.4 
पुष्करेणैवमुक्तस्य पुण्यश्लोकस्य मन्युना।
व्यदीर्यतेव हृदयं न चैनं किंचिदब्रवीत्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
जब पुष्कर ने ऐसा कहा, तब धर्मात्मा राजा नल का हृदय शोक से विदीर्ण हो गया, किन्तु उन्होंने उससे कुछ नहीं कहा ॥4॥
 
When Pushkara said this, the heart of the virtuous King Nala was torn with grief, but he did not say anything to him. ॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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