श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 61: नलका जूएमें हारकर दमयन्तीके साथ वनको जाना और पक्षियोंद्वारा आपद्‍ग्रस्त नलके वस्त्रका अपहरण  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  3.61.28 
श्रान्तस्य ते क्षुधार्तस्य चिन्तयानस्य तत् सुखम्।
वने घोरे महाराज नाशयिष्याम्यहं क्लमम्॥ २८॥
 
 
अनुवाद
'महाराज! जब आप इस घोर वन में थककर भूखे हो जायेंगे और अपने पिछले सुखों को याद करके अत्यन्त दुःखी हो जायेंगे, तब मैं आपको सान्त्वना देकर आपकी पीड़ा दूर करुँगा।
 
'Maharaj! When you are tired and hungry in this dreadful forest and think of your past happiness and become very sad, then I will alleviate your pain by consoling you.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)