Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.61.26-27: 'महाराज! जब मैं आपके निश्चय का बार-बार चिंतन करता हूँ, तो मेरा हृदय व्याकुल हो जाता है और मेरे सारे अंग शिथिल हो जाते हैं। आपका राज्य छीन लिया गया है। आपकी संपत्ति नष्ट हो गई है। आपके शरीर पर वस्त्र भी नहीं हैं और आप भूख और परिश्रम से पीड़ित हैं। ऐसी स्थिति में मैं आपको इस निर्जन वन में असहाय कैसे छोड़ सकता हूँ?' | mahabharat अध्याय 3.61: नलका जूएमें हारकर दमयन्तीके साथ वनको जाना और पक्षियोंद्वारा आपद्ग्रस्त नलके वस्त्रका अपहरण । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
'महाराज! जब मैं आपके निश्चय का बार-बार चिंतन करता हूँ, तो मेरा हृदय व्याकुल हो जाता है और मेरे सारे अंग शिथिल हो जाते हैं। आपका राज्य छीन लिया गया है। आपकी संपत्ति नष्ट हो गई है। आपके शरीर पर वस्त्र भी नहीं हैं और आप भूख और परिश्रम से पीड़ित हैं। ऐसी स्थिति में मैं आपको इस निर्जन वन में असहाय कैसे छोड़ सकता हूँ?'
‘Maharaj! When I think again and again about your resolve, my heart becomes agitated and all my limbs become weak. Your kingdom has been snatched away. Your wealth has been destroyed. You do not even have clothes on your body and you are suffering from hunger and hard work. In such a condition, how can I leave you helpless in this deserted forest?
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥