श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 61: नलका जूएमें हारकर दमयन्तीके साथ वनको जाना और पक्षियोंद्वारा आपद्‍ग्रस्त नलके वस्त्रका अपहरण  »  श्लोक 22-23
 
 
श्लोक  3.61.22-23 
एष विन्ध्यो महाशैल: पयोष्णी च समुद्रगा।
आश्रमाश्च महर्षीणां बहुमूलफलान्विता:॥ २२॥
एष पन्था विदर्भाणामसौ गच्छति कोसलान्।
अत: परं च देशोऽयं दक्षिणे दक्षिणापथ:॥ २३॥
 
 
अनुवाद
'यह महान् विंध्य पर्वत दिखाई देता है और यही पयोष्णी नदी है जो समुद्र में जाकर मिलती है। यहाँ महर्षियों के अनेक आश्रम हैं, जहाँ फल और मूल प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। यही विदर्भ का मार्ग है और यही कोसल तक जाता है। इसके बाद दक्षिण दिशा में जो देश है, वह दक्षिणापथ कहलाता है।'॥22-23॥
 
‘This great mountain Vindhya is visible and this is the river Payoshni which flows into the sea. There are many ashrams of great sages here, where fruits and roots can be found in abundance. This is the route to Vidarbha and it goes to Kosal. The country after this in the southern direction is called Dakshinapath.'॥ 22-23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)