ऋतुपर्णं स राजानमुपतस्थे सुदु:खित:।
भृतिं चोपययौ तस्य सारथ्येन महीपते॥ २५॥
अनुवाद
युधिष्ठिर! अत्यन्त दुःखी होकर वे राजा ऋतुपर्ण की सेवा में उपस्थित हुए और उनके सारथि बनकर जीविका चलाने लगे॥ 25॥
Yudhishthira! Being very sad, he presented himself in the service of King Rituparna and began earning his livelihood by becoming his charioteer.॥ 25॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि कुण्डिनं प्रति कुमारयो: प्रस्थापने षष्टितमोऽध्याय:॥ ६०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलकी कन्या और पुत्रको कुण्डिनपुर भेजनेसे सम्बन्ध रखनेवाला साठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६०॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)