|
| |
| |
श्लोक 3.6.25  |
वैशम्पायन उवाच
अन्योन्यमनुनीयैवं भ्रातरौ द्वौ महाद्युती।
विदुरो धृतराष्ट्रश्च लेभाते परमां मुदम्॥ २५॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| वैशम्पायनजी कहते हैं: जनमेजय! विदुर और धृतराष्ट्र दोनों महाबली भाई एक-दूसरे से विनती करके बहुत प्रसन्न हुए। |
| |
| Vaishmpayana says: Janamejaya! Both the mighty brothers Vidura and Dhritarashtra after pleading with each other became very happy. |
| |
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि विदुरप्रत्यागमने षष्ठोऽध्याय:॥ ६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अरण्यपर्वमें विदुरप्रत्यागमनविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ॥ ६॥
|
| |
| ✨ ai-generated |
| |
|