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mahabharat 3.6.20: 'भरतकुलभूषण! आज मैं अपने शरीर की विचित्र दशा देख रहा हूँ, क्योंकि मैं दिन-रात आपके लिए जागता रहा हूँ।'   |   mahabharat अध्याय 3.6: धृतराष्ट्रका संजयको भेजकर विदुरको वनसे बुलवाना और उनसे क्षमा-प्रार्थना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  3.6.20 
अद्य रात्रौ दिवा चाहं त्वत्कृते भरतर्षभ।
प्रजागरे प्रपश्यामि विचित्रं देहमात्मन:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
'भरतकुलभूषण! आज मैं अपने शरीर की विचित्र दशा देख रहा हूँ, क्योंकि मैं दिन-रात आपके लिए जागता रहा हूँ।'
 
'Bharatkulbhushan! Today I am seeing a strange condition of my body because I have stayed awake day and night for you.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)