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mahabharat 3.6.1: वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन! जब विदुरजी पाण्डवों के आश्रम में गए, तब बुद्धिमान राजा धृतराष्ट्र को बड़ा पश्चाताप हुआ॥1॥   |   mahabharat अध्याय 3.6: धृतराष्ट्रका संजयको भेजकर विदुरको वनसे बुलवाना और उनसे क्षमा-प्रार्थना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 6: धृतराष्ट्रका संजयको भेजकर विदुरको वनसे बुलवाना और उनसे क्षमा-प्रार्थना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.6.1 
वैशम्पायन उवाच
गते तु विदुरे राजन्नाश्रमं पाण्डवान् प्रति।
धृतराष्ट्रो महाप्राज्ञ: पर्यतप्यत भारत॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन! जब विदुरजी पाण्डवों के आश्रम में गए, तब बुद्धिमान राजा धृतराष्ट्र को बड़ा पश्चाताप हुआ॥1॥
 
Vaishampayanji says- Rajan! When Vidurji went to the ashram of Pandavas, the wise king Dhritarashtra felt great remorse. 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)