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mahabharat 3.59.15-18: 'महाराज! नगर के नागरिक अपने सभी मंत्रियों के साथ आपसे मिलने के लिए भक्तिपूर्वक द्वार पर खड़े हैं। कृपया उन्हें दर्शन दीजिए।' दमयंती ने बार-बार यही वचन दोहराए। मनोहर नेत्रों वाली विदर्भ राजकुमारी इस प्रकार विलाप करती रही, परंतु कलियुग से ग्रस्त राजा ने उससे बात तक नहीं की। तब नगर के सभी मंत्री और नागरिक शोक से आहत और लज्जित होकर यह कहते हुए अपने-अपने घर चले गए कि 'यह राजा नल अब अधिक समय तक राज्य नहीं कर पाएगा।' युधिष्ठिर! पुष्कर और नल के बीच का वह द्यूत-क्रीड़ा कई महीनों तक चलता रहा। पुण्यश्लोक महाराज नल उसमें हारते रहे।।15-18।।   |   mahabharat अध्याय 3.59: नलमें कलियुगका प्रवेश एवं नल और पुष्करकी द्यूतक्रीडा, प्रजा और दमयन्तीके निवारण करनेपर भी राजाका द्यूतसे निवृत्त नहीं होना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 59: नलमें कलियुगका प्रवेश एवं नल और पुष्करकी द्यूतक्रीडा, प्रजा और दमयन्तीके निवारण करनेपर भी राजाका द्यूतसे निवृत्त नहीं होना  »  श्लोक 15-18
 
 
श्लोक  3.59.15-18 
राजन् पौरजनो द्वारि त्वां दिदृक्षुरवस्थित:।
मन्त्रिभि: सहित: सर्वै राजभक्तिपुरस्कृत:॥ १५॥
तं द्रष्टुमर्हसीत्येवं पुन: पुनरभाषत।
तां तथा रुचिरापाङ्गीं विलपन्तीं तथाविधाम्॥ १६॥
आविष्ट: कलिना राजा नाभ्यभाषत किंचन।
ततस्ते मन्त्रिण: सर्वे ते चैव पुरवासिन:॥ १७॥
नायमस्तीति दु:खार्ता व्रीडिता जग्मुरालयान्।
तथा तदभवद् द्यूतं पुष्करस्य नलस्य च।
युधिष्ठिर बहून् मासान् पुण्यश्लोकस्त्वजीयत॥ १८॥
 
 
अनुवाद
'महाराज! नगर के नागरिक अपने सभी मंत्रियों के साथ आपसे मिलने के लिए भक्तिपूर्वक द्वार पर खड़े हैं। कृपया उन्हें दर्शन दीजिए।' दमयंती ने बार-बार यही वचन दोहराए। मनोहर नेत्रों वाली विदर्भ राजकुमारी इस प्रकार विलाप करती रही, परंतु कलियुग से ग्रस्त राजा ने उससे बात तक नहीं की। तब नगर के सभी मंत्री और नागरिक शोक से आहत और लज्जित होकर यह कहते हुए अपने-अपने घर चले गए कि 'यह राजा नल अब अधिक समय तक राज्य नहीं कर पाएगा।' युधिष्ठिर! पुष्कर और नल के बीच का वह द्यूत-क्रीड़ा कई महीनों तक चलता रहा। पुण्यश्लोक महाराज नल उसमें हारते रहे।।15-18।।
 
'Maharaj! The citizens of the city are standing at the door with all their ministers with devotion to meet you. Please give them darshan.' Damayanti repeated these words again and again. The Vidarbha princess with lovely eyes kept on wailing in this manner, but the king possessed by Kaliyug did not even talk to her. Then all the ministers and citizens of the city, overwhelmed with grief and feeling ashamed, went to their respective homes saying that 'This King Nala is not going to rule the kingdom for long.' Yudhishthira! That game of dice between Pushkar and Nala continued for many months. Punyasloka Maharaja Nala kept on losing in it. 15-18.
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलद्यूते एकोनषष्टितमोऽध्याय:॥ ५९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलद्यूतविषयक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५९॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)