श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 57: स्वयंवरमें दमयन्तीद्वारा नलका वरण, देवताओंका नलको वर देना, देवताओं और राजाओंका प्रस्थान, नल-दमयन्तीका विवाह एवं नलका यज्ञानुष्ठान और संतानोत्पादन  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  3.57.9 
तस्या गात्रेषु पतिता तेषां दृष्टिर्महात्मनाम्।
तत्र तत्रैव सक्ताऽभून्न चचाल च पश्यताम्॥ ९॥
 
 
अनुवाद
वहाँ पहुँचते ही उन महामनस्वी राजाओं की दृष्टि दमयन्ती के शरीर के अंगों पर पड़ी। राजाओं में से जिसने भी उसे देखा, उसकी दृष्टि दमयन्ती के शरीर के जिस अंग पर भी पड़ी, वहीं टिक गई, और वहाँ से हट न सकी॥9॥
 
As soon as they reached there, the gaze of those great-minded kings fell on Damayanti's body parts. Whoever among the kings saw her, his gaze remained fixed on whatever part of Damayanti's body, and could not move away from there.॥ 9॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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