श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 57: स्वयंवरमें दमयन्तीद्वारा नलका वरण, देवताओंका नलको वर देना, देवताओं और राजाओंका प्रस्थान, नल-दमयन्तीका विवाह एवं नलका यज्ञानुष्ठान और संतानोत्पादन  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  3.57.8 
दमयन्ती ततो रङ्गं प्रविवेश शुभानना।
मुष्णन्ती प्रभया राज्ञां चक्षूंषि च मनांसि च॥ ८॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् सुन्दर मुखवाली दमयन्ती अपनी कान्ति से राजाओं के नेत्रों को मोहित करती हुई और उनके हृदय को हर लेती हुई रंगशाला में आई॥8॥
 
Thereafter, the beautiful-faced Damayanti entered the theatre, captivating the eyes of the kings with her radiance and stealing the hearts of the kings. 8॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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