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mahabharat 3.57.42-43h: राजन! उस सुन्दरी को पाकर धर्मात्मा राजा नल ने भी उसके साथ उसी प्रकार क्रीड़ा की, जैसे इन्द्र शची के साथ करते हैं।   |   mahabharat अध्याय 3.57: स्वयंवरमें दमयन्तीद्वारा नलका वरण, देवताओंका नलको वर देना, देवताओं और राजाओंका प्रस्थान, नल-दमयन्तीका विवाह एवं नलका यज्ञानुष्ठान और संतानोत्पादन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 57: स्वयंवरमें दमयन्तीद्वारा नलका वरण, देवताओंका नलको वर देना, देवताओं और राजाओंका प्रस्थान, नल-दमयन्तीका विवाह एवं नलका यज्ञानुष्ठान और संतानोत्पादन  »  श्लोक 42-43h
 
 
श्लोक  3.57.42-43h 
अवाप्य नारीरत्नं तु पुण्यश्लोकोऽपि पार्थिव:॥ ४२॥
रेमे सह तया राजञ्छच्येव बलवृत्रहा।
 
 
अनुवाद
राजन! उस सुन्दरी को पाकर धर्मात्मा राजा नल ने भी उसके साथ उसी प्रकार क्रीड़ा की, जैसे इन्द्र शची के साथ करते हैं।
 
King! After getting that beautiful lady, the virtuous King Nala also played with her in the same way as Indra does with Shachi.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)