श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 57: स्वयंवरमें दमयन्तीद्वारा नलका वरण, देवताओंका नलको वर देना, देवताओं और राजाओंका प्रस्थान, नल-दमयन्तीका विवाह एवं नलका यज्ञानुष्ठान और संतानोत्पादन  »  श्लोक 35-36h
 
 
श्लोक  3.57.35-36h 
प्रत्यक्षदर्शनं यज्ञे गतिं चानुत्तमां शुभाम्॥ ३५॥
नैषधाय ददौ शक्र: प्रीयमाण: शचीपति:।
 
 
अनुवाद
शचीपति इन्द्र ने प्रसन्न होकर निषादराज नल को यह वर दिया कि 'मैं यज्ञ में तुम्हें प्रत्यक्ष दर्शन दूँगा और अन्त में शुभ फल प्रदान करूँगा' ॥35 1/2॥
 
Sachipati Indra was pleased and gave this boon to Nishadharaj Nala that 'I will give you direct darshan in the Yagya and will bestow auspiciousness in the end'. 35 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)