श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 57: स्वयंवरमें दमयन्तीद्वारा नलका वरण, देवताओंका नलको वर देना, देवताओं और राजाओंका प्रस्थान, नल-दमयन्तीका विवाह एवं नलका यज्ञानुष्ठान और संतानोत्पादन  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  3.57.32 
यावच्च मे धरिष्यन्ति प्राणा देहे शुचिस्मिते।
तावत् त्वयि भविष्यामि सत्यमेतद् ब्रवीमि ते॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
हे निर्मल मुस्कान वाली देवी! जब तक मेरे शरीर में प्राण हैं, तब तक मैं आपके प्रति सदैव अनन्य प्रेम रखूँगा, यह मैं आपको पूर्ण सत्यनिष्ठा से वचन देता हूँ।॥32॥
 
'O Goddess with a pure smile! As long as there is life in my body, I will always have unconditional love for you, I promise you this with all sincerity.'॥ 32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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