श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 57: स्वयंवरमें दमयन्तीद्वारा नलका वरण, देवताओंका नलको वर देना, देवताओं और राजाओंका प्रस्थान, नल-दमयन्तीका विवाह एवं नलका यज्ञानुष्ठान और संतानोत्पादन  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  3.57.30 
दमयन्तीं तु कौरव्य वीरसेनसुतो नृप:।
आश्वासयद् वरारोहां प्रहृष्टेनान्तरात्मना॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
कुरुनन्दन! वीरसेनकुमार नल ने प्रसन्न मन से सुन्दरी दमयन्ती को आश्वासन देते हुए कहा-॥30॥
 
Kurunandan! Veersenkumar Nala gave assurance to the beautiful Damayanti with a joyful heart and said – ॥ 30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)