श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 57: स्वयंवरमें दमयन्तीद्वारा नलका वरण, देवताओंका नलको वर देना, देवताओं और राजाओंका प्रस्थान, नल-दमयन्तीका विवाह एवं नलका यज्ञानुष्ठान और संतानोत्पादन  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  3.57.28 
ततो हाहेति सहसा मुक्त: शब्दो नराधिपै:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
तब अचानक अन्य राजाओं के मुंह से कोलाहलपूर्ण चीखें निकलने लगीं। 28.
 
Then suddenly cries of uproar came out from the mouths of the other kings. 28.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)