श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 57: स्वयंवरमें दमयन्तीद्वारा नलका वरण, देवताओंका नलको वर देना, देवताओं और राजाओंका प्रस्थान, नल-दमयन्तीका विवाह एवं नलका यज्ञानुष्ठान और संतानोत्पादन  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  3.57.25 
छायाद्वितीयो म्लानस्रग्रज:स्वेदसमन्वित:।
भूमिष्ठो नैषधश्चैव निमेषेण च सूचित:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
उन पाँचों में एक पुरुष ऐसा है जिसकी छाया गिर रही है। उसके गले की माला मुरझा गई है। उसके शरीर पर धूल के कण और पसीने की बूँदें भी दिखाई दे रही हैं। वह पृथ्वी को स्पर्श करता हुआ बैठा है और उसकी आँखों की पलकें झुकी हुई हैं। इन लक्षणों से दमयंती ने निषादराज नल को पहचान लिया॥25॥
 
Among those five, there is one man whose shadow is falling. The garland around his neck has withered. Dust particles and drops of sweat are also visible on his body. He is sitting touching the earth and the eyelids of his eyes are falling. From these characteristics, Damayanti recognized Nishadraj Nala.॥25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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