श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 57: स्वयंवरमें दमयन्तीद्वारा नलका वरण, देवताओंका नलको वर देना, देवताओं और राजाओंका प्रस्थान, नल-दमयन्तीका विवाह एवं नलका यज्ञानुष्ठान और संतानोत्पादन  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  3.57.21 
स्वं चैव रूपं कुर्वन्तु लोकपाला महेश्वरा:।
यथाहमभिजानीयां पुण्यश्लोकं नराधिपम्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
'महेश्वर तथा जगत के रक्षक अपने-अपने रूप प्रकट करें, जिससे मैं पुण्यात्मा राजा नल को पहचान सकूँ।'
 
'Maheshwar and the protectors of the world should reveal their forms so that I may recognise the virtuous King Nala.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)