| श्री महाभारत » पर्व 3: वन पर्व » अध्याय 57: स्वयंवरमें दमयन्तीद्वारा नलका वरण, देवताओंका नलको वर देना, देवताओं और राजाओंका प्रस्थान, नल-दमयन्तीका विवाह एवं नलका यज्ञानुष्ठान और संतानोत्पादन » श्लोक 14-16h |
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| | | | श्लोक 3.57.14-16h  | श्रुतानि देवलिङ्गानि तर्कयामास भारत।
देवानां यानि लिङ्गानि स्थविरेभ्य: श्रुतानि मे॥ १४॥
तानीह तिष्ठतां भूमावेकस्यापि न लक्षये।
सा विनिश्चित्य बहुधा विचार्य च पुन: पुन:॥ १५॥
शरणं प्रति देवानां प्राप्तकालममन्यत। | | | | | | अनुवाद | | भरत! उसने देवताओं के जो लक्षण सुने थे, उन पर भी विचार किया। वह मन ही मन कहने लगी, 'मैंने देवताओं की पहचान कराने वाले जो लक्षण और चिह्न बड़ों से सुने हैं, वे मुझे यहाँ भूमि पर बैठे इन पाँचों पुरुषों में से किसी में भी दिखाई नहीं दे रहे हैं।' अनेक प्रकार से विचार करने और बार-बार विचार करने के बाद उसने देवताओं की शरण लेने का यही उचित समय समझा। | | | | Bhaarat! She also thought about the signs of gods she had heard. She started saying to herself, 'The signs and symbols that identify gods that I have heard from the elders, I am not able to see them in any of these five men sitting here on the ground.' After thinking in many ways and thinking again and again, she considered it to be the right time to take refuge in the gods. 14-15 1/2. | | ✨ ai-generated | | |
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