श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 57: स्वयंवरमें दमयन्तीद्वारा नलका वरण, देवताओंका नलको वर देना, देवताओं और राजाओंका प्रस्थान, नल-दमयन्तीका विवाह एवं नलका यज्ञानुष्ठान और संतानोत्पादन  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  3.57.13 
कथं हि देवाञ्जानीयां कथं विद्यां नलं नृपम्।
एवं संचिन्तयन्ती सा वैदर्भी भृशदु:खिता॥ १३॥
 
 
अनुवाद
'हाय! मैं देवताओं को कैसे जान सकती हूँ और राजा नल को कैसे पहचान सकती हूँ?' यह विचार करके विदर्भ की राजकुमारी दमयंती बहुत दुःखी हुईं।
 
Oh! How can I know the gods and how can I recognize King Nala?' Princess Damayanti of Vidarbha was very saddened by this thought.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)