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mahabharat 3.56.16: देवताओं को प्रण करके और विशेषतः दूसरों के कल्याण के लिए प्रयत्न आरम्भ करके, अब मैं यहाँ स्वार्थ के लिए कैसे उत्साहित हो सकता हूँ?॥16॥   |   mahabharat अध्याय 3.56: नलका दमयन्तीसे वार्तालाप करना और लौटकर देवताओंको उसका संदेश सुनाना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 56: नलका दमयन्तीसे वार्तालाप करना और लौटकर देवताओंको उसका संदेश सुनाना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  3.56.16 
कथं ह्यहं प्रतिश्रुत्य देवतानां विशेषत:।
परार्थे यत्नमारभ्य कथं स्वार्थमिहोत्सहे॥ १६॥
 
 
अनुवाद
देवताओं को प्रण करके और विशेषतः दूसरों के कल्याण के लिए प्रयत्न आरम्भ करके, अब मैं यहाँ स्वार्थ के लिए कैसे उत्साहित हो सकता हूँ?॥16॥
 
'After making a vow to the gods and especially after beginning my endeavour for the welfare of others, how can I now be enthusiastic about selfish ends here?॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)