श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 55: नलका दूत बनकर राजमहलमें जाना और दमयन्तीको देवताओंका संदेश सुनाना  » 
 
 
अध्याय 55: नलका दूत बनकर राजमहलमें जाना और दमयन्तीको देवताओंका संदेश सुनाना
 
श्लोक 1-2:  महर्षि बृहदश्व कहते हैं - भरत! देवताओं को सहायता करने का वचन देकर राजा नल हाथ जोड़कर उनके पास गए और उनसे पूछा - 'आप कौन हैं? और वह कौन पुरुष है जिसके पास आपने मुझे दूत बनाकर भेजने की इच्छा की है तथा आपका वह कौन सा कार्य है जो मेरे द्वारा सम्पन्न हो सकता है, यह ठीक-ठीक बताइए।'॥1-2॥
 
श्लोक 3:  जब निषादों के राजा नल ने यह प्रश्न किया, तो इन्द्र ने कहा, 'राजन्! मुझे देवता मानिए। मैं दमयन्ती को प्राप्त करने के लिए यहाँ आया हूँ।'
 
श्लोक 4-5:  'मैं इन्द्र हूँ, वही अग्निदेव हैं, वही जल के स्वामी वरुण हैं और वही प्राणियों के शरीर का नाश करने वाले यमराज हैं। तुम दमयन्ती के पास जाकर उसे हमारे आगमन का समाचार दो और कहो - महेन्द्र आदि लोकपाल तुम्हारे दर्शनार्थ आ रहे हैं। 4-5॥
 
श्लोक 6:  इन्द्र, अग्नि, वरुण और यम- ये देवता तुम्हें पाना चाहते हैं। तुम इनमें से किसी एक को अपना पति चुन लो।॥6॥
 
श्लोक 7:  इन्द्र के ऐसा कहने पर नल ने हाथ जोड़कर कहा, 'हे देवताओं! मेरा भी वही उद्देश्य है जो आप लोगों का है; अतः मैं उसी उद्देश्य से आया हूँ, अतः मुझे दूत बनाकर मत भेजिए।'
 
श्लोक 8:  हे देवराज! जो पुरुष किसी स्त्री को प्राप्त करने का मन बना चुका है, वह उस स्त्री को छोड़कर दूसरी स्त्री को कैसे प्राप्त कर सकता है? अतः आप सभी मेरे ऐसे कथन को क्षमा करें॥8॥
 
श्लोक 9:  देवताओं ने कहा - हे निषधनराज! आपने तो हमें अपना कार्य पूर्ण करने की प्रतिज्ञा कर ली है, फिर आप उस प्रतिज्ञा को कैसे पूरा नहीं कर सकते? अतः हे निषधनराज! आप शीघ्र जाइए, विलम्ब न कीजिए॥9॥
 
श्लोक 10:  महर्षि बृहदश्व कहते हैं - हे राजन! देवताओं की यह बात सुनकर निषादनरेश ने उनसे पुनः पूछा - 'विदर्भराज के सब महल सुरक्षित हैं (पहरेदारों सहित)। मैं उनमें कैसे प्रवेश कर सकता हूँ?'॥10॥
 
श्लोक 11:  तब इन्द्र ने पुनः कहा, "तुम वहाँ प्रवेश कर सकोगे।" तत्पश्चात् "ऐसा ही हो" कहकर राजा नल दमयन्ती के महल में चले गये।
 
श्लोक 12:  वहाँ उन्होंने देखा कि विदर्भ की अत्यंत सुन्दरी राजकुमारी दमयन्ती अपनी सखियों से घिरी हुई अपने सुन्दर शरीर और दिव्य कांति से अत्यंत शोभायमान हो रही थी॥12॥
 
श्लोक 13:  उसके अंग अत्यंत सुकोमल हैं, कमर से ऊपर का भाग अत्यंत पतला है, उसके नेत्र अत्यंत सुंदर हैं और वह अपने तेज से चंद्रमा की कांति को भी तुच्छ जान पड़ती है॥13॥
 
श्लोक 14:  उस सुन्दर हँसती हुई राजकुमारी को देखते ही नल के हृदय में काम की अग्नि प्रज्वलित हो उठी; तथापि अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने की इच्छा से उन्होंने उस काम-पीड़ा को मन में ही दबाए रखा॥14॥
 
श्लोक 15:  निषधराज को वहाँ आया देखकर अन्तःपुर की सब सुन्दर स्त्रियाँ चकित हो गईं और उनके तेज से विरक्त होकर अपने-अपने स्थान से उठकर खड़ी हो गईं ॥15॥
 
श्लोक 16:  वे सब बहुत प्रसन्न और आश्चर्यचकित होकर राजा नल की सुन्दरता की प्रशंसा करने लगे। राजा नल ने उनसे कुछ नहीं कहा, परन्तु मन ही मन उनका बहुत आदर किया।
 
श्लोक 17:  वह सोचने लगी, 'ओह! इसका सौन्दर्य अद्भुत है, इसकी प्रभा अत्यन्त मनमोहक है और इस महात्मा का धैर्य भी अद्वितीय है। मैं सोचती हूँ कि यह कौन है? सम्भव है कि यह कोई देवता, यक्ष या गन्धर्व हो।'॥17॥
 
श्लोक 18:  वे लज्जाशील सुन्दरियाँ नल के तेज से चकित हो गईं और उससे बोल भी न सकीं।
 
श्लोक 19:  तब हँसकर बातें करने वाली दमयन्ती ने आश्चर्यचकित होकर मुस्कुराते हुए वीर नल से इस प्रकार पूछा॥19॥
 
श्लोक 20-22h:  'आप कौन हैं? आपके शरीर के सभी अंग दोषरहित और अत्यंत सुन्दर हैं। आप मेरे हृदय की उत्तेजना को बढ़ा रही हैं। भोले योद्धा! आप देवताओं के समान यहाँ पधारे हैं। मैं आपका परिचय जानना चाहता हूँ। आपका इस महल में आना कैसे संभव हुआ? आपको किसी ने कैसे नहीं देखा? मेरा यह महल अत्यंत सुरक्षित है और यहाँ के राजा का शासन अत्यंत कठोर है - वे अपराधियों को अत्यंत कठोर दंड देते हैं।' विदर्भ की राजकुमारी के पूछने पर नल ने इस प्रकार उत्तर दिया।
 
श्लोक 22-23:  नल ने कहा- कल्याणी! मुझे नल ही समझो। मैं देवताओं का दूत बनकर यहाँ आया हूँ। इंद्र, अग्नि, वरुण और यम तुम्हें प्राप्त करना चाहते हैं। शोभने! इनमें से किसी एक को अपना पति चुनो।
 
श्लोक 24:  उन देवताओं के प्रभाव से मैं इस महल में प्रवेश कर गया हूँ और मुझे कोई देख नहीं पाया है। अन्दर प्रवेश करते समय न तो मुझे किसी ने देखा है और न ही किसी ने मुझे रोका है॥ 24॥
 
श्लोक 25:  हे भद्रे! इसीलिए महान देवताओं ने मुझे यहाँ भेजा है। हे शुभ! इसे सुनकर अपनी इच्छानुसार निर्णय करो।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)