श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 54: स्वर्गमें नारद और इन्द्रकी बातचीत, दमयन्तीके स्वयंवरके लिये राजाओं तथा लोकपालोंका प्रस्थान  »  श्लोक 5-7
 
 
श्लोक  3.54.5-7 
तामस्वस्थां तदाकारां सख्यस्ता जज्ञुरिङ्गितै:।
ततो विदर्भपतये दमयन्त्या: सखीजन:॥ ५॥
न्यवेदयत् तामस्वस्थां दमयन्तीं नरेश्वरे।
तच्छ्रुत्वा नृपतिर्भीमो दमयन्तीं सखीगणात्॥ ६॥
चिन्तयामास तत् कार्यं सुमहत् स्वां सुतां प्रति।
किमर्थं दुहिता मेऽद्य नातिस्वस्थेव लक्ष्यते॥ ७॥
 
 
अनुवाद
सखियों ने संकेतों से दमयन्ती के ऐसे रूप और अस्वस्थता का कारण जान लिया। तत्पश्चात् दमयन्ती की सखियों ने विदर्भराज को उसके अस्वस्थ होने का समाचार सुनाया। सखियों से दमयन्ती के विषय में ऐसी बातें सुनकर राजा भीम ने बहुत सोचा, परन्तु उन्हें अपनी पुत्री के लिए कोई विशेष कार्य नहीं सूझा। वे सोचने लगे, 'मेरी पुत्री इन दिनों स्वस्थ क्यों नहीं दिखाई देती?'॥5-7॥
 
The friends came to know through signs what was the reason for her such appearance and ill-health. Thereafter Damayanti's friends informed the King of Vidarbha about her ill-health. After hearing such things about Damayanti from the friends, King Bhima thought a lot, but he could not think of any important work for his daughter. He started thinking, 'Why does my daughter not look healthy these days?'॥ 5-7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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