श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 54: स्वर्गमें नारद और इन्द्रकी बातचीत, दमयन्तीके स्वयंवरके लिये राजाओं तथा लोकपालोंका प्रस्थान  »  श्लोक 17-18
 
 
श्लोक  3.54.17-18 
बृहदश्व उवाच
नारदस्य वच: श्रुत्वा पप्रच्छ बलवृत्रहा।
धर्मज्ञा: पृथिवीपालास्त्यक्तजीवितयोधिन:॥ १७॥
शस्त्रेण निधनं काले ये गच्छन्त्यपराङ्मुखा:।
अयं लोकोऽक्षयस्तेषां यथैव मम कामधुक्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
बृहदश्व कहते हैं - हे राजन! नारदजी के वचन सुनकर बल और वृत्रासुर का वध करने वाले इन्द्र ने उनसे पूछा - 'मुनि! जो धर्म में निपुण और प्राणों की आसक्ति रहित होकर युद्ध करते हैं तथा बिना पीठ दिखाए युद्ध करते हुए शस्त्र से घायल होकर मर जाते हैं, उनके लिए हमारा यह स्वर्ग चिरस्थायी हो जाता है और मेरी ही भाँति उन्हें भी इच्छित भोग प्रदान करता है॥ 17-18॥
 
Brihadaswa says - O King! On hearing the words of Narada, Indra, the slayer of Bala and Vritraasura, asked him - 'Sage! For those kings who are wise in Dharma and who fight without any attachment to their lives and who die by being struck by a weapon while fighting without showing their backs, this heaven of ours becomes everlasting and like me, it grants them also the desired enjoyments.॥ 17-18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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