| श्री महाभारत » पर्व 3: वन पर्व » अध्याय 54: स्वर्गमें नारद और इन्द्रकी बातचीत, दमयन्तीके स्वयंवरके लिये राजाओं तथा लोकपालोंका प्रस्थान » श्लोक 13-14 |
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| | | | श्लोक 3.54.13-14  | एतस्मिन्नेव काले तु सुराणामृषिसत्तमौ।
अटमानौ महात्मानाविन्द्रलोकमितो गतौ॥ १३॥
नारद: पर्वतश्चैव महाप्राज्ञौ महाव्रतौ।
देवराजस्य भवनं विविशाते सुपूजितौ॥ १४॥ | | | | | | अनुवाद | | उसी समय देवर्षिप्रवर, महाव्रती, महाप्रज्ञ नारद और पर्वत महात्मा यहाँ से विचरण करते हुए इन्द्रलोक को गए। वहाँ उन्होंने देवराज के भवन में प्रवेश किया। उस भवन में उनका विशेष आदर और पूजन हुआ। 13-14॥ | | | | At the same time, Devarshipravar, the great fasting person, Mahapragya Narada and Parvat Mahatma, wandering from here, went to Indraloka. There he entered the house of Devraj. He was given special respect and worship in that building. 13-14॥ | | ✨ ai-generated | | |
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