श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 53: नल-दमयन्तीके गुणोंका वर्णन, उनका परस्पर अनुराग और हंसका दमयन्ती और नलको एक-दूसरेके संदेश सुनाना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  3.53.21 
दमयन्तीसकाशे त्वां कथयिष्यामि नैषध।
यथा त्वदन्यं पुरुषं न सा मंस्यति कर्हिचित्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
'निषधनराज! मैं दमयन्ती के समक्ष आपकी ऐसी स्तुति करूँगा कि वह आपके अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष को अपने हृदय में स्थान नहीं देगी।'
 
'King of Nishadhan! I will praise you in such a way to Damayanti that she will never give place to any other man in her heart except you.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)