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mahabharat 3.53.15: इस पृथ्वी पर मनुष्यों में श्रेष्ठ नर नल भी अतुलनीय रूपवान थे। उनके रूप को देखकर ऐसा प्रतीत होता था मानो स्वयं कामदेव ही नल के रूप में उत्पन्न हुए हों ॥15॥   |   mahabharat अध्याय 3.53: नल-दमयन्तीके गुणोंका वर्णन, उनका परस्पर अनुराग और हंसका दमयन्ती और नलको एक-दूसरेके संदेश सुनाना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 53: नल-दमयन्तीके गुणोंका वर्णन, उनका परस्पर अनुराग और हंसका दमयन्ती और नलको एक-दूसरेके संदेश सुनाना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.53.15 
नलश्च नरशार्दूलो लोकेष्वप्रतिमो भुवि।
कन्दर्प इव रूपेण मूर्तिमानभवत् स्वयम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
इस पृथ्वी पर मनुष्यों में श्रेष्ठ नर नल भी अतुलनीय रूपवान थे। उनके रूप को देखकर ऐसा प्रतीत होता था मानो स्वयं कामदेव ही नल के रूप में उत्पन्न हुए हों ॥15॥
 
Nala, the best human being, was also incomparably beautiful among the humans on this earth. Looking at his form, it seemed as if Kamdev himself had been born in the form of a pipe. 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)